संक्षिप्त समझ
रुपया-डॉलर विनिमय दर बताती है कि 1 अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए कितने रुपये चाहिए।
मान लीजिए, $1 = ₹83 है। इसका अर्थ है कि एक डॉलर खरीदने के लिए ₹83 चाहिए। यदि यह दर बढ़कर ₹87 हो जाती है, तो रुपया कमजोर हुआ है, क्योंकि अब उसी एक डॉलर के लिए अधिक रुपये देने पड़ रहे हैं।
अगर दर ₹83 से घटकर ₹80 हो जाए, तो रुपया मजबूत हुआ है।
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी भूमिका मांग और आपूर्ति की होती है।
यह कैसे काम करता है?
डॉलर को बाजार में बिकने वाली किसी वस्तु की तरह समझिए।
जब भारत में कई लोग और कंपनियाँ डॉलर खरीदना चाहती हैं, जैसे कच्चा तेल, मशीनरी, तकनीक या अन्य वस्तुओं के आयात के लिए, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है। अगर डॉलर की आपूर्ति उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, तो रुपये के मुकाबले डॉलर महंगा हो सकता है।
इससे रुपया कमजोर हो सकता है।
इसके विपरीत, जब भारत में अधिक डॉलर आते हैं, तो रुपये को समर्थन मिल सकता है। उदाहरण के लिए, विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में निवेश करते हैं, भारतीय निर्यातकों को विदेशों से भुगतान मिलता है या विदेशों में रहने वाले भारतीय भारत में पैसा भेजते हैं।
कुछ अन्य कारक भी विनिमय दर को प्रभावित करते हैं:
- महँगाई: लंबे समय में कम महँगाई किसी मुद्रा के लिए सहायक हो सकती है।
- ब्याज दरें: बेहतर रिटर्न विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकता है।
- व्यापार संतुलन: यदि कोई देश निर्यात की तुलना में बहुत अधिक आयात करता है, तो उसे अधिक विदेशी मुद्रा की आवश्यकता पड़ सकती है।
- वैश्विक भरोसा: आर्थिक या राजनीतिक अनिश्चितता के समय निवेशक अक्सर अमेरिकी डॉलर को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि उसका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक उपयोग होता है और इसे अपेक्षाकृत सुरक्षित संपत्ति माना जाता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भी विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है, ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि RBI रुपये की एक स्थायी विनिमय दर तय करता है।
एक वास्तविक उदाहरण
मान लीजिए, एक भारतीय कंपनी $1 मिलियन की मशीनरी आयात करती है।
यदि $1 = ₹83 है, तो मशीनरी की कीमत लगभग ₹8.3 करोड़ होगी।
अगर रुपया कमजोर होकर $1 = ₹87 हो जाए, तो वही मशीनरी ₹8.7 करोड़ की पड़ेगी।
डॉलर में मशीनरी की कीमत नहीं बदली, लेकिन रुपये की कमजोरी के कारण भारतीय कंपनी के लिए वह महंगी हो गई।
इसका महत्व
कमजोर रुपया कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी जैसी आयातित वस्तुओं को महंगा बना सकता है। इसका असर धीरे-धीरे कंपनियों और आम उपभोक्ताओं तक पहुँच सकता है।
हालाँकि, कमजोर रुपये से निर्यातकों को लाभ हो सकता है, क्योंकि विदेशों से मिलने वाली उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर अधिक राशि मिलती है।
इसके विपरीत, मजबूत रुपया आयात को सस्ता कर सकता है, लेकिन भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को विदेशी खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत महंगा बना सकता है।
इसलिए रुपये का मजबूत या कमजोर होना अपने आप में अच्छा या बुरा नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि रुपया क्यों बदल रहा है, कितनी तेजी से बदल रहा है और उसका व्यापक अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।