संक्षिप्त उत्तर
हरियाली अमावस्या श्रावण (सावन) मास में आने वाली अमावस्या तिथि है, जो सामान्यतः जुलाई या अगस्त में पड़ती है। हरियाली का अर्थ है हरापन या हरितिमा। यह पर्व मानसून के आगमन से धरती की उर्वरता, वृक्षों के महत्व और समृद्धि की कामना से जुड़ा हुआ है।
वृत्तांत
हरियाली अमावस्या की जड़ें भारत की प्राचीन ऋतु-चेतना में मिलती हैं। भीषण गर्मी के बाद जब वर्षा होती है, तो सूखी धरती हरे पौधों और फसलों से भर उठती है। कृषि प्रधान समाज ने इस परिवर्तन को ईश्वरीय कृपा और जीवन के पुनर्जन्म के रूप में देखा।
यह पर्व श्रावण मास में आता है, जो विशेष रूप से भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इसलिए अनेक भक्त शिव मंदिरों में जाकर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इस अवसर पर तालाबों, बागों और मंदिरों के पास मेले लगाए जाते हैं।
इस पर्व का एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ भी है। अमावस्या अंधकार और शून्यता का प्रतीक मानी जाती है, जबकि वर्षा के बाद फैलने वाली हरियाली नवजीवन और पुनर्निर्माण का संदेश देती है। यह हमें सिखाती है कि कठिन समय के बाद भी जीवन फिर से खिल सकता है।
ऐतिहासिक रूप से भी राजाओं और स्थानीय समुदायों द्वारा बरगद, पीपल, नीम और अन्य दीर्घायु वृक्षों का रोपण वर्षा ऋतु में कराया जाता था, क्योंकि यह उनके बढ़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है। यही व्यावहारिक परंपरा आगे चलकर हरियाली अमावस्या का महत्वपूर्ण अंग बन गई।
उदयपुर का प्रसिद्ध हरियाली अमावस्या मेला
हरियाली अमावस्या का सबसे रंगीन और प्रसिद्ध उत्सव राजस्थान के उदयपुर में मनाया जाता है, जिसे "झीलों की नगरी" कहा जाता है। यह दो दिवसीय मेला परंपरागत रूप से फतेह सागर झील, सहेलियों की बाड़ी और आसपास के उद्यानों में आयोजित होता है, जहाँ वर्षा ऋतु पूरे क्षेत्र को हरियाली से भर देती है। यहाँ लोग लोक संगीत, पारंपरिक राजस्थानी नृत्य, झूले, हस्तशिल्प बाजार और सावन के विशेष व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
इस मेले की एक विशेषता इसका दिन के अनुसार विभाजन है। पहले दिन सामान्यतः पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रवेश मिलता है, जबकि दूसरा दिन परंपरागत रूप से महिलाओं के लिए विशेष होता है। इस दिन महिलाएँ रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में मेले का आनंद लेती हैं और लहरिया जैसी प्रतियोगिताओं एवं अन्य गतिविधियों में भाग लेती हैं।
क्या आप जानते हैं?
- हरियाली अमावस्या को कई क्षेत्रों में श्रावण अमावस्या भी कहा जाता है।
- इस दिन वृक्ष लगाना पुण्यकारी कार्य माना जाता है, क्योंकि उसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को मिलता है।
इसका महत्व
हरियाली अमावस्या कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है:
- पर्यावरणीय: वृक्षारोपण और प्रकृति संरक्षण की प्रेरणा देती है।
- कृषि संबंधी: वर्षा ऋतु में खेती के सशक्त होने का संकेत देती है।
- आध्यात्मिक: सावन में कृतज्ञता और विनम्रता का अवसर प्रदान करती है।
- सामाजिक: मेले, पूजा और सामूहिक उत्सव लोगों को एक साथ लाते हैं।
आधुनिक समय में यह पर्व पर्यावरण जागरूकता और सांस्कृतिक निरंतरता का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है।
संदर्भ
- स्कंद पुराण: श्रावण मास की पवित्रता और शिव उपासना से जुड़े व्रत एवं अनुष्ठानों का वर्णन।
- पद्म पुराण: वृक्षारोपण और ऋतु आधारित धार्मिक आचरण के पुण्य का उल्लेख।
- मत्स्य पुराण: वृक्ष लगाने और उनकी रक्षा को समाजोपयोगी तथा पुण्यकारी कार्य बताया गया है।
- उदयपुर नगर निगम (UMC): हरियाली अमावस्या मेले की आधिकारिक जानकारी, जिसमें मेले की दो दिवसीय परंपरा, फतहसागर झील और सहेलियों की बाड़ी में आयोजन तथा दिन-वार सहभागिता का विवरण शामिल है।