⚡ 2-Minute Read

भगवान जगन्नाथ की आँखें इतनी बड़ी और गोल क्यों हैं? जानिए इसका रहस्य

Read this article in:
भगवान जगन्नाथ की आँखें इतनी बड़ी और गोल क्यों हैं? जानिए इसका रहस्य

लेखक का दृष्टिकोण

भगवान जगन्नाथ की बड़ी गोल आँखें वास्तविक मानव आकृति दिखाने के लिए नहीं बनाई गईं। वे उनकी अखंड और सर्वव्यापी दृष्टि का प्रतीक हैं।

संक्षिप्त उत्तर

भगवान जगन्नाथ की बड़ी, गोल और बिना पलक वाली आँखें उनकी सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और करुणामय दृष्टि का प्रतीक मानी जाती हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार वे बिना किसी भेदभाव के समस्त संसार पर समान दृष्टि रखते हैं। वहीं इतिहासकार इसे ओडिशा की विशिष्ट मूर्तिकला और स्थानीय परंपराओं से विकसित हुई एक अनूठी कलात्मक शैली भी मानते हैं।

वृत्तांत

एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न भगवान विष्णु की दिव्य प्रतिमा स्थापित करना चाहते थे। तब देवशिल्पी विश्वकर्मा ने मूर्ति बनाने का दायित्व स्वीकार किया, लेकिन एक शर्त रखी कि जब तक उनका कार्य पूरा न हो जाए, कोई भी द्वार नहीं खोलेगा।

कई दिनों तक कोई आहट न मिलने पर राजा चिंतित हो गए और उन्होंने कार्य पूरा होने से पहले ही कक्ष का द्वार खोल दिया। उसी क्षण विश्वकर्मा अदृश्य हो गए और मूर्तियाँ अधूरी अवस्था में रह गईं। इन्हीं अधूरी प्रतीत होने वाली मूर्तियों को भगवान की इच्छा मानकर स्थापित किया गया। उनकी बड़ी गोल आँखें और सरल स्वरूप उसी परंपरा का हिस्सा माने जाते हैं।

एक अन्य वैष्णव परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण जब अपने भक्तों के प्रेम और भक्ति का अनुभव करते हैं, तो उनका हृदय आनंद से भर उठता है और उनकी आँखें विस्मय एवं प्रेम से विस्तृत हो जाती हैं। भगवान जगन्नाथ का स्वरूप उसी दिव्य भाव का प्रतीक माना जाता है।

वास्तुकला

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएँ पवित्र नीम (दारु) की लकड़ी से निर्मित होती हैं। यही विशेषता उन्हें भारत के अधिकांश प्रमुख मंदिरों की पत्थर की प्रतिमाओं से अलग बनाती है।

इस परंपरा की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक है नवकलेवर। निश्चित ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर विशेष वर्षों में नई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं और पुरानी प्रतिमाओं का अत्यंत श्रद्धापूर्वक मंदिर परिसर में ही संस्कार किया जाता है। यह परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है।

स्वयं श्री जगन्नाथ मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका विशाल शिखर, भव्य द्वार और सूक्ष्म पत्थर की नक्काशी मध्यकालीन ओडिशा की स्थापत्य कला की श्रेष्ठता को दर्शाते हैं।

क्या आप जानते हैं?

भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की प्रतिमाएँ स्थायी नहीं होतीं। विशेष अवसर पर होने वाले नवकलेवर उत्सव में पवित्र नीम वृक्षों से नई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं। इसके बाद पुरानी प्रतिमाओं का मंदिर परिसर में अत्यंत गोपनीय और वैदिक विधि से संस्कार किया जाता है। यह परंपरा विश्व की सबसे अनूठी धार्मिक परंपराओं में गिनी जाती है।

इसका महत्व

भगवान जगन्नाथ का अनूठा स्वरूप यह संदेश देता है कि दिव्यता बाहरी सौंदर्य या पूर्ण शारीरिक रूप में नहीं, बल्कि करुणा और सर्वव्यापकता में निहित है।

सांस्कृतिक दृष्टि से जगन्नाथ परंपरा ओडिशा की पहचान का अभिन्न अंग है। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली रथ यात्रा विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है, जिसमें लाखों श्रद्धालु और पर्यटक सम्मिलित होते हैं।

संदर्भ

  • स्कन्द पुराण : पुरुषोत्तम माहात्म्य (पुरी और भगवान जगन्नाथ की महिमा का विस्तृत वर्णन)
  • ब्रह्म पुराण : पुरुषोत्तम क्षेत्र से संबंधित अध्याय
  • मदला पांजी : श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी का पारंपरिक ऐतिहासिक अभिलेख
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) : श्री जगन्नाथ मंदिर के संरक्षण एवं ऐतिहासिक अभिलेख
  • Epigraphia Indica : पूर्वी गंग वंश और श्री जगन्नाथ मंदिर से संबंधित अभिलेख

प्रश्नोत्तरी

1. भगवान जगन्नाथ की बड़ी गोल आँखों का मुख्य प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

2. नवकलेवर समारोह में लकड़ी की मूर्तियों का ______________ किया जाता है।